इस्लामिक बैंकिंग क्या होती है? और यह कैसे काम करती है?

क्या आपने कभी इस्लामिक बैंकिंग के बारे में सुना है और उसके अनोखे सिद्धांतों को जानने का मन किया है?

आज इस ब्लॉग में हम एक अहम विषय पर चर्चा करेंगे वह है “इस्लामिक बैंकिंग”। हम जानेंगे कि इस्लामी बैंकिंग क्या है? और इसके प्रमुख सिद्धांत क्या हैं? इस ब्लॉग के माध्यम से हम इस वित्तीय प्रणाली में न्याय के अनमोल मूल्य को समझेंगे।

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इस्लामिक बैंकिंग

इस्लामिक बैंकिंग क्या है?: (What is Islamic Banking in Hindi)

इस्लामिक बैंकिंग को शरीयत बैंकिंग या सरिया बैंकिंग भी कहते हैं। इस्लामिक कानून व्यवस्था मतलब कि सरिया के सिद्धांतों पर काम करने वाली बैंकिंग व्यवस्था को इस्लामिक बैंकिंग कहते हैं। यह सामान्य बैंकिंग प्रणाली से अलग होती है।

शरीयत के अनुसार इसमें ऋण देना और ऋण लेना दोनों को ही गुनाह माना जाता है इसलिए इसमें नाम मात्र के बराबर ऋण लिया जाता है। इस्लामिक बैंक का मुख्यालय मिश्र (काहिरा) में है।

2011 में भारत में इसका आगमन हुआ, भारत में इसकी एकमात्र ब्रांच केरल के कोच्चि में सिथित है। इसमें राज्य सरकार की हिस्सेदारी 11% है। इस बैंकिंग प्रणाली में बैंक फंड के ट्रस्टी के रूप में भूमिका निभाता है। यहां लोग अपनी मर्जी से पैसा जमा करते हैं और जब चाहे निकाल भी सकते हैं।

यह एक प्रकार का बचत खाता है। इस बचत खाता पर ऋण नहीं दिया जाता है परंतु बैंक आपके रुपए  से प्रॉफिट कमाता है तो उस प्रॉफिट को खाताधारकों में गिफ्ट के रूप में बांट दिया जाता है।

विश्व में वित्तीय प्रणालियों के क्षेत्र में एक विशेष तकनीक है, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अपनाई जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य ब्याजदार लेनदेन से बचना है और समृद्धि को जनता के बीच संवाहित करना है।

इस्लामिक वित्तीय प्रणाली में ब्याज नहीं होता, बल्कि निवेश और सहयोग पर आधारित होती है। इसके प्रमुख सिद्धांतों में “रीबा” का प्रतिबंध, “हलाल” और “हराम” की मान्यता, “घरारी” और “मेसिर” से बचाव शामिल होता है।

इस्लामिक बैंकिंग के प्रकार: (Types of Islamic Banking in Hindi)

रीबा (Riba), हराम और हलाली (Haram and Halali), घरारी (Gharari), मेसिर और क़िमारी (Messir and Kimari), शरीयत बोर्ड (Sharia Board).

रीबा: (Riba in Hindi)

रीबा, जिसे ब्याज भी कहते हैं, जो इस बैंकिंग प्रणाली के अभियांत्रिकी सिद्धांत का मूल नियम है। यह कुरान और सुन्नत से आया है और इसे भारतीय अर्थशास्त्रियों ने भी स्वीकारा है।

इस प्रकार के अंतर दर्शाता है कि पारस्परिक बैंकिंग में ऋण लेनेवाले व्यक्ति से ब्याज का प्रतिशत मिलता है, परंतु इस बैंकिंग प्रणाली में यह पूर्णतः प्रतिबंधित है। इस बैंकिंग प्रणाली का उद्देश्य समृद्धि को समान रूप से बांटना है, जिसमें ऋणाधिकारी और इन्वेस्टर दोनों का अपना हिस्सा होता है।

ब्याज मुक्त इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम:

ब्याज मुक्त इस्लामी बैंकिंग प्रणाली का उद्देश्य संपत्ति और देनदारियों के बीच न्याय से सम्पन्न संबंध स्थापित करना है।

इसमें संपत्ति का उद्धार व्यक्तिगत उधारों के माध्यम से किया जाता है, जिसमें ब्याज का प्रयोग नहीं होता। बजाए ब्याज के, इस्लामी बैंक प्रणाली में विभिन्न तरीकों से संपत्ति के वृद्धि और नुकसान का समयबद्ध वितरण होता है।

हराम और हलाली: (Haram and Halali in Hindi)

हलाल और हराम भी इस्लामिक बैंकिंग के दो सिद्धांत हैं। ये शब्द अक्सर इस्लामी खाद्य पदार्थ नियमों से जुड़े होते हैं। शरीयत द्वारा अनैतिक, निषिद्ध और अशुद्ध माने जाने वाले सभी उत्पादों, सेवाओं और आर्थिक कार्यों को “हराम” कहा जाता है। हराम शब्द में तंबाकू, शराब, हथियार, सूअर का मांस, वेश्यावृत्ति, अश्लील साहित्य आदि शामिल हैं।

वित्तीय न्याय की मान्यता:

इस बैंकिंग प्रणाली में “हलाल” और “हराम” की मान्यता काफी महत्वपूर्ण है। इस्लाम में कुछ ऐसे कारोबारी गतिविधियां हैं जो नहीं की जानी चाहिए, और ये मान्यता इस्लामी बैंकिंग में भी ध्यान में रखी जाती है।

इस्लामी बैंक वित्तीय समृद्धि को हासिल करने के लिए उचित मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, जिससे लोग इस्लामिक मान्यताओं के अनुरूप उचित निवेश कर सकें।

घरारी और मेसिर से बचाव:

इस बैंकिंग प्रणाली में “घरारी” और “मेसिर” के प्रति सख्त विरोध किया जाता है। घरारी, जिसे अनिश्चितता के रूप में व्याख्या किया जा सकता है, और मेसिर, जिसे जुआ और शराबीपन के साथ जोड़ा जा सकता है, जो इस बैंकिंग प्रणाली में स्वीकार्य नहीं हैं।

इसके बजाय, इस्लामी बैंकिंग व्यवस्था में निवेश करने से पहले संबंधित लेनदेन को पूर्वानुमान किया जाता है और संभावित जोखिमों का सम्मान किया जाता है।

शरीयत बोर्ड: (Sharia Board in Hindi)

“Islamic Financial Institution” के रूप में काम करने से पहले, प्रत्येक बैंक एक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इस्लामिक बैंक का प्रबंधन शरीयत बोर्ड को सूचित करता है और सलाह देता है। “Sharia audits” में विशिष्ट विशेषज्ञता वाले आंतरिक कर्मचारी होते हैं।

उन्हें लगातार परिचालन गतिविधियों को नियंत्रित करना होता है और परिणामों के बारे में शरीयत बोर्ड को सूचित करना होता है, The Islamic Financial Services Board (IFSB), जो पारंपरिक बैंकों के लिए Banking Supervision पर बेसल समिति के समान है,

एक अतिरिक्त बाहरी Sharia Audit की सिफारिश करता है, जो वर्ष में एक बार होता है। Shariah Board द्वारा लिए गए निर्णय इस्लामिक बैंक्स के लिए बाध्यकारी हैं और बोर्ड के सदस्यों के आधार पर भिन्न हो सकते हैं। इससे विभिन्न इस्लामिक बैंकों की तुलना करना मुश्किल हो जाता है।

शरीयबोर्ड का आकार, संरचना और स्थापना वित्तीय संस्थान के Association के Articles या Comparable Documents के साथ-साथ देश के वैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करती है। शरीयत बोर्ड के सदस्यों को Sharia-Scholars कहा जाता है और वे Islamic Jurists हैं।

इस्लामिक बैंकिंग के लाभ: (Advantage of Islamic Banking in Hindi)

इस बैंकिंग प्रणाली का आधार “Justice in Exchange” है। अनैतिकता का मतलब है कि पूरे समाज को नुकसान पहुंचाना ऐसा इस बैंकिंग प्रणाली में मना किया गया है।

इस्लामी वित्त के साधनों से बचना चाहिए:  ब्याज दरों का लगाना, यह शोषण के सबसे बुरे रूपों में से एक है। जो ब्याज दर इसमें नहीं लगाये जाते है।

इसमें भौतिक शर्तों को निर्दिष्ट किए बिना बेचने के लिए सहमत होना या जो विक्रेता के कब्जे में नहीं है, उस वस्तु की बिक्री शामिल करना। शेयर मार्किट या हेज फंड में डील करना क्योंकि उनमें मेसिर (सट्टा लेनदेन) का तत्व होता है।

ऐसे लेन-देन जिनमें प्रतिबंधित और हानिकारक उद्योग जैसे ड्रग्स, अवैध हथियार, वेश्यावृत्ति और पोर्नोग्राफ़ी शामिल हैं उसे तुरंत रोकना है।

इस्लामिक बैंकिंग के नुकसान: (Disadvantage of Islamic Banking in Hindi)

आदर्श निवेश मॉडल सुविधाजनक नहीं:- इस बैंकिंग प्रणाली में आदर्श निवेश मोड मुदारबाह और मुशरकाह मॉडल हैं। मुदराबा मॉडल में, एक पार्टी पूंजी प्रदान करती है, और दूसरी पार्टी उस पूंजी का निवेश करती है।

इस मॉडल में लाभ पूर्व निर्धारित अनुपात में वितरण किया जाता है। इस्लामिक बैंकिंग के तहत चल रहे बैंक के पैसों को गैर इस्लाम के कार्यों में नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए इसे मुस्लिम बैंक भी कहा जाता है।

Liquidity Instruments की अनुपस्थिति: Liquidity की कमी और अधिकता की समस्याओं के प्रबंधन के लिए Liquidity साधनों का उपयोग किया जाता है।

कुछ सबसे महत्वपूर्ण Liquidity Instruments: Treasury Bills और Other Market Securities हैं। दुर्भाग्य से, कई इस्लामी बैंकों में Liquidity की कमी है।

Advanced Technology and Media का अभाव: हमारी लगातार बढ़ती डिजिटल दुनिया में सभी बैंक धीरे-धीरे डिजिटलाइज होते जा रही है। जो कि अपने खाताधारकों को घर बैठे बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है।

जिसमें कि मोबाइल बैंकिंग, इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग जैसी सुविधाएं शामिल है जो कि इस बैंकिंग प्रणाली में नहीं हैं। वर्तमान में कुछ बैंकों ने अपनी वेबसाइट और एप्लीकेशन लॉन्च किए हैं।

इस्लामिक बैंकिंग से सम्बंधित अन्य जानकारी के लिए वीडियो देखें:

इस्लामिक बैंकिंग का इतिहास: (History of Islamic Banking in Hindi)

इस्लामिक बैंक की शुरुआत 1940 के दशक में हुई थी। सर्वप्रथम इस समय ही सैद्धांतिक और बुनियादी दृष्टिकोण विकसित किए गए। बाद में, 1963 में Sparkasse ने मिश्र के Mit-Ghamar में इस परियोजना को शुरू किया गया।

इस परियोजना का उद्देश्य ब्याज मुक्त विद्या का परीक्षण करना था। इसे धीरे-धीरे विकसित किया गया और आज हम इसे इस्लामिक बैंकिंग के रूप में जानते हैं। राजनीतिक दबाव के कारण 1967 में इसका प्रयोग बंद कर दिया गया। इस्लाम ने इस बैंकिंग पद्धति को अच्छा और व्यवहारिक बताया है।

1971 में मिस्र सरकार ने Interest Free “Nasir Social Bank” की स्थापना की गई और 1973 में 20 सदस्य देशों के साथ “Islamic Development Bank” की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य सदस्य देशों को शरिया के अनुसार मुस्लिम समुदायों की सामाजिक प्रगति और आर्थिक विकास का समर्थन करना है।

बैंक की वर्तमान सदस्यता में 56 देश शामिल हैं। इसके साथ ही बहुत से इस्लामिक बैंकों को विभिन्न देशों में खोला जाने लगा। नब्बे के दशक में उन्होंने अपने कार्यों को यूरोप और मध्य एशिया में फैला दिया।

आज पूरी तरह से ब्याज मुक्त वित्तीय प्रणाली वाले तीन देश हैं: पाकिस्तान, सूडान और ईरान। 2006 में रिजर्व बैंक ने इस बैंकिंग प्रणाली की कार्यशैली का अध्ययन करने के लिए आनन्द सिन्हा की अगुवाई में एक समिति गठित की थी, जिसने मौजूदा नियमों में संशोधन का सुझाव दिया था।

कुछ समय बाद इस मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया, लेकिन अपनी मलेशिया यात्रा के समय प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह इस बैंकिंग प्रणाली से प्रभावित हुए।

इसके बाद फिर इस बैंकिंग प्रणाली में हलचल हुई और वित्त मन्त्रालय के कहने पर योजना आयोग द्वारा गठित रघुराम राजन समिति की सिफारिशों पर भी गौर नहीं किया गया।

यह बैंक ना ब्याज लेता है ना ब्याज देता है तो अपने कर्मचारियों को यह वेतन कहां से देता है और अन्य खर्चे कहां से पूरे करता हैं? दरअसल यह बैंकिंग प्रणाली पिछले दरवाजे से अपनी सारी सुविधाओं को पूरा करती है।

इसमें खाताधारक के जमा पूंजी से या मकान दुकान या फिर जमीन को खरीदना है और उसे खरीदार के पास लाभ लेकर बेच देता है। इस्लामिक बैंक खरीदार को यह EMI की सुविधा भी देता है।

यहां तक की इससे बैंक को जो मुनाफा होता है उसे अपने खाताधारकों के बीच बांट दिया जाता है। इसके साथ-साथ बैंक अपने खर्चों को भी इससे पूरा करती है। अगर बैंक को किसी प्रकार का घाटा होता है तो इसका घाटा भी खाताधारकों में बांट दिया जाता है और घाटे को पूरा किया जाता है।

यह बैंकिंग प्रणाली कई देशों में प्रचलित है। जैसे: Standard Chartered and Hong Kong और Shanghai Banking Corporation अपने Banking Operation के तहत Islamic Banking को आगे बढ़ा रहे हैं। इसका मुख्य मकसद सरिया के सिद्धांत के अनुसार ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। यह पूंजी के लेनदेन के खिलाफ नहीं है परंतु इसके कुछ नियमों का पालन करना होता है।

भारत में इस्लामिक बैंकों की सूची: (List of Islamic Bank in India)

  • Atharvved Finance Corporation
  • TAMEEM IMPEX.
  • Associated Industrial Credit Society Al-Siraat Investment & Banking
  • The Bank of Tokyo-Mitsubishi UFJ, Ltd
  • Baitun Nasr Urban Cooperative Society.

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निष्कर्ष:

इस ब्लॉग में हम ने जाना कि इस्लामिक बैंकिंग एक न्याययुक्त वित्तीय प्रणाली है जो वित्तीय समृद्धि को समर्थित करती है। यह विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लोगों को उनके धार्मिक मूल्यों के अनुरूप वित्तीय उपाय प्रदान करती है। इसके सिद्धांतों में ब्याज के प्रति सख्त विरोध, न्याय के मूल्य, और घरारी और मेसिर से बचाव का प्रोत्साहन शामिल होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न: (FAQs)

Q. क्या इस्लामिक बैंकिंग केवल मुस्लिमों के लिए है?

Ans. नहीं, यह बैंकिंग प्रणाली सभी व्यक्तियों के लिए उपलब्ध है जो इसके सिद्धांतों और मान्यताओं का पालन करने को तैयार होते हैं।

Q. क्या इस्लामिक बैंकिंग में ऋण के लिए कोई ब्याज नहीं होता?

Ans. इस बैंकिंग प्रणाली में ऋण के लिए कोई ब्याज नहीं होता है, और इसकी बजाय निवेश और सहयोग पर आधारित होती है।

Q. क्या इस्लामिक बैंकिंग वित्तीय सुरक्षितता की दृष्टि से सुरक्षित है?

Ans. यह बैंकिंग प्रणाली वित्तीय सुरक्षितता की दृष्टि से सुरक्षित है, क्योंकि यह निवेश को समझदारीपूर्वक करती है और घरारी के खिलाफ है।

Q. क्या इस्लामिक बैंकिंग वित्तीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है?

Ans. जी हां, यह बैंकिंग प्रणाली वित्तीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है, क्योंकि इसके सिद्धांत न्याययुक्त और समृद्धि को समर्थित करते हैं।

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